Madhya Pradesh

जबलपुर | कैंसर से जिंदगी की जंग हार गई मां | अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं थे पैसे, आशीष ठाकुर और मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति बने सहारा

कैंसर से जिंदगी की जंग हार गई मां | अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं थे पैसे, आशीष ठाकुर और मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति बने सहारा

जबलपुर। कभी-कभी कुछ घटनाएं सिर्फ खबर नहीं होतीं, बल्कि समाज के सामने ऐसा आईना रख देती हैं, जिसमें व्यवस्था, गरीबी और इंसानियत—तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। जबलपुर में सामने आई ऐसी ही एक मार्मिक घटना ने हर संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दिया।

68 वर्षीय कैंसर पीड़ित श्याम बाई, निवासी ग्राम इंद्र नगर, पंचायत बिलपुरवा, पिछले कई दिनों से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही थीं। उनका बेटा राजेश, जो मजदूरी कर किसी तरह अपने परिवार का पालन-पोषण करता है, अपनी मां को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था। लगभग दस दिनों तक मेडिकल अस्पताल में इलाज चला, लेकिन चिकित्सकों ने बीमारी अंतिम चरण में होने की बात कहते हुए उन्हें घर ले जाने की सलाह दे दी।

गरीबी ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद राजेश के पास न एम्बुलेंस का इंतजाम था और न ही मां को सुरक्षित घर ले जाने की पर्याप्त व्यवस्था। मजबूरी में वह अपनी बीमार मां को अस्पताल परिसर के बाहर बने शेड में लेकर बैठा रहा। 2 अगस्त की रात वहीं श्याम बाई ने अंतिम सांस ली।

इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी बेटे के लिए सबसे बड़ा दुःख था। मां का पार्थिव शरीर सामने था, लेकिन अंतिम संस्कार कराने तक के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। वह सुबह तक शव के पास बैठा रहा, कभी मदद की आस में इधर-उधर देखता, तो कभी किसी से सहायता की उम्मीद करता। उसके अनुसार उसने एम्बुलेंस और अन्य सहायता के लिए भी प्रयास किए, लेकिन उसे सहयोग नहीं मिल सका। परिचितों और जनप्रतिनिधियों से भी संपर्क किया, पर निराशा ही हाथ लगी।

इसी दौरान स्थानीय लोगों ने इस पूरे मामले की जानकारी मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति के संयोजक आशीष ठाकुर तक पहुंचाई। बताया जाता है कि स्वयं अस्वस्थ होने के बावजूद जैसे ही उन्हें इस परिवार की बेबसी का पता चला, उन्होंने बिना देर किए समिति के सेवकों को सक्रिय किया। दूसरी ओर, राजेश भी अपनी मां के पार्थिव शरीर को छोड़कर मदद की उम्मीद में आशीष ठाकुर के घर पहुंचा। उसकी आंखों में बेबसी थी और शब्दों में सिर्फ एक विनती—”मेरी मां का सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करा दीजिए।”

इसके बाद मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति की टीम तुरंत हरकत में आई। समिति के सेवकों ने श्याम बाई के पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ चौहानी श्मशान घाट पहुंचाया और सभी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया। समिति ने परिवार को आवश्यक मानवीय सहयोग भी उपलब्ध कराया।

श्मशान घाट पर मौजूद लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं, जब राजेश ने अपनी मां को अंतिम विदाई देते हुए कहा कि उसे लगा था अब वह बिल्कुल अकेला है, लेकिन मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति ने उसे यह एहसास कराया कि इंसानियत अभी भी जिंदा है।

यह घटना सिर्फ एक अंतिम संस्कार की कहानी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश भी है। एक तरफ गरीबी और मजबूरी से जूझता बेटा था, तो दूसरी तरफ ऐसे लोग, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के मानव सेवा को अपना धर्म माना। आशीष ठाकुर और मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति ने यह साबित किया कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और मानवीयता होती है।

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